इंसान को जानवर कहना उचित नहीं है , इंसान जानवर से भी बत्तर हो चुका है। गैंगरेप जैसी घटनाएं आजकल आम हो चुकी है। राजधानी दिल्ली की चकाचौंध में आये दिन बुरी नियत का शिकार होती लड़कियां सुरक्षा के कड़े इंतजाम होते हुए भी पूरी तरह असुरक्षित हैं उन्ही लोगों के बीच जिनसे वो घिरी है। ऐसी घटनाएं एक दुसरे के प्रति अविश्वास का रास्ता खोलती हैं। इंसानों की वह्शित्यत दिल दहला देती है, किसी की सरल सहज ज़िन्दगी के बारे में सोचने पर मजबूर करती है। तमाशाई इस दुनिया में करारा तमाचा सा पड़ता है और अपराधियों को ऐसे घिनौने अपराध करने का बढ़ावा मिलता है कितना गिर चुका है हमारा समाज जो किसी युवती को दर्दनाक तरीके से हवश की आग में जला देता है छोड़ देता है उसे ज़िन्दगी मौत के बीच तड़पने को, तनिक विचार नहीं करता। नयी नयी तकनीक नयी सोच आज समाज का स्वरूप बदल चुका है लेकिन फिर भी वक़्त के चलते हमारे इसी समाज ने इंसानियत का गला घोंट दिया है। खुद को भारतीय कहकर गर्वान्वित होता संस्कारों की तिलांजलि दे बैठा है। मनुष्य का जन्म पाकर भी उसका सही अर्थ खो बैठा है। ऐसे अपराधों को अंजाम देने वाले ऐसी घटिया सोंच में पलने वाले लोग दोषी है जिन्होंने इसे गन्दा किया है। गैंग रेप में दोषी उन अपराधियों को उनके शर्मनाक अपराध की सजा मिलनी चाहिए। मगर जब तक युवक या पुरुष लड़कियों या महिलायों के प्रति सम्मान की भावना नहीं रखते। हवश जैसी छोटी सोंच के दायरे से बाहर नहीं निकलते। हम ऐसे अपराधों पर अंकुश नहीं लगा सकते।
~ Prasneet Yadav ~
~ Prasneet Yadav ~
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