सिनेमा पर्दे पर हम बहुत कुछ देखते हैं। सितारों के हँसते हुए रोते हुए चेहरे। उन पर फिल्माए गाने भी। वो अपने किरदार में जीते हैं और हम उनके किरदारों की ज़िन्दगी देखते हैं। उनकी अपनी असल ज़िन्दगी पर्दे के ठीक पीछे होती है। कितनी परेशानियों से गुज़रते होंगे वो कितना कुछ सहते होंगे वो ? कहते हैं न “जो जितना बर्दास्त करता है उतना आगे जाता है ” एक और फ़िल्मी सितारे का अंत दुःख हुआ मुझे, इसलिए नहीं की वो एक अभिनेत्री थी बल्कि इसलिए की मै एक इंसान हूँ और इसी समाज में रहता हूँ । ये मेरा कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं इसे वहां से दूर रखना। ये मेरी अपनी बात है बस ये कहना है ऐसी खबरें हमें झझकोर कर रख देती हैं, ऐसी घटनाएं हमें कुछ सोचने पर मजबूर करती हैं। ऐसा क्यों होता है जवाब दे सकते हो तो जरूर देना ? ये एक अभिनेत्री की मौत पर ज़िन्दगी और मौत का सबसे बड़ा सवाल है। इस घटना को सुनने के बाद चंद अल्फाज़ साझा कर रहा हूँ ….
सितारों की रोशनी में ये कैसा अन्धेरा ,
जाने कौन सा जहर पी रहा बालीवुड ,
न किसी का पता न खबर किसी की ,
जाने किस दौर में जी रहा बालीवुड ,
मौत न जाने कैसी है ये ?
मौत न जाने किसकी है ये ?
सिसकियाँ भरता आह समेटे ,
कहता न कुछ
होठों को अपने सी रहा बालीवुड ,
रात घनी अब अकेला है वो ,
थर थर काँपे डर के मारे ,
खोज में निकला अपने अतीत की ,
पल पल मरता मिटता ,
ज़िन्दगी अपनी खो रहा बालीवुड ,
होता है क्या क्या जहाँ-तहां में ,
पर्दा ही पर्दा रहता क्यों ?
देखो कितने बेदर्द तरह से
रो रहा बालीवुड,
ये मत कहना मुझसे तुम
मिला नया कुछ लिखने को फिर ,
शौक नहीं ये कहने का था ,
इन भावनाओं में बहने का था ,
चिता जली है फिर से कोई
और उठ रही आग की लपटें,
जिस पर सो रहा बालीवुड ,
पल पल मरता मिटता ….
सिसकियाँ भरता आह समेटे।
~ प्रसनीत यादव ~
सितारों की रोशनी में ये कैसा अन्धेरा ,
जाने कौन सा जहर पी रहा बालीवुड ,
न किसी का पता न खबर किसी की ,
जाने किस दौर में जी रहा बालीवुड ,
मौत न जाने कैसी है ये ?
मौत न जाने किसकी है ये ?
सिसकियाँ भरता आह समेटे ,
कहता न कुछ
होठों को अपने सी रहा बालीवुड ,
रात घनी अब अकेला है वो ,
थर थर काँपे डर के मारे ,
खोज में निकला अपने अतीत की ,
पल पल मरता मिटता ,
ज़िन्दगी अपनी खो रहा बालीवुड ,
होता है क्या क्या जहाँ-तहां में ,
पर्दा ही पर्दा रहता क्यों ?
देखो कितने बेदर्द तरह से
रो रहा बालीवुड,
ये मत कहना मुझसे तुम
मिला नया कुछ लिखने को फिर ,
शौक नहीं ये कहने का था ,
इन भावनाओं में बहने का था ,
चिता जली है फिर से कोई
और उठ रही आग की लपटें,
जिस पर सो रहा बालीवुड ,
पल पल मरता मिटता ….
सिसकियाँ भरता आह समेटे।
~ प्रसनीत यादव ~
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