Friday, September 20, 2013

हिंदी मेरे देश की हिंदी और ए बी सी डी ई एफ जी

हिंदी मेरे देश की हिंदी दिन-दिन घटती जाए ,
हिंदी के इस देश में अंग्रेजी राज़ चलाये ,
अंग्रेजी में होय आरती अब अंग्रेजी के होते बोल,
हिंदी तो बस नाम की हिंदी जिसका न कोई मोल….

तोते रटे रटाये जाते अंग्रेजी सिखलाये जाते ,
ए बी सी डी ई एफ जी बस यही यहाँ बतलाये जाते ,
क्या पढेंगे अब हम क ख ग ?
जब आती हमें शर्म
अंग्रेजी की गरमा गर्मी हिंदी हुई नरम….

हिंदी मेरे देश की हिंदी अपने घाव दिखाए ,
तड़प-तड़प के बोले वो क्या ?
सुनना न चाहे कोई हिंदी ,
कहना न चाहे कोई हिंदी ….

अंग्रेजी की मारा-मारी अंग्रेजी की भागम-भागी
हुए यहाँ गुमराह सभी
हिंदी दिए भुलाए ,
दिए जालाये चौखट पर हिंदी अब इंतज़ार करे ,
हैरान होकर बोले वो कोई तो मुझसे प्यार करे ….

ए बी सी डी ई एफ जी में आया कितना दम ,
हिंदी हुई नरम बाबू हिंदी हुई नरम ,
हिंदी की क्लास से अब बच्चे गायब रहते है ,
आता हमको सब कुछ है बाहर वो ऐसा कहते है….

हिंदी से इतना भाग रहे देखो दुश्मन जाग रहे ,
अंग्रेजी ने मारा सबको अंग्रेजी में ढाला सबको ,
हिंदी हुई हमारी बैरी आती नहीं शर्म ?
हिंदी मेरे देश की हिंदी दिन-दिन मिटती जाए ,
अपनों के हांथों लुटती जाए ….

पराये देशों में पा रही सम्मान ,
अफ़सोस अपने ही देश में मिल रहा अपमान,
क्या लिखकर अब हासिल करे हिंदी का दर्द ?
हिंदी हुई बेवफा सबकी अंग्रेजी बनी सनम….

ए बी सी डी ई एफ जी सर पर इसे बिठाया हमने
चकाचौंध की नगरी में जगह-जगह सजाया हमने,
हमने ही भाव-ताव बढाए इसके ,
अंग्रेजी हिंदी पर भारी इस पर आया बड़ा वजन….

हिंदी मेरे देश की हिंदी ये मुद्दा बड़ा गरम,
कहती हिंदी ऐसा कुछ आई हूँ लौटकर एक आस लगाए बैठी हूँ ,
प्यासी हूँ मै फिर भी प्यास बुझाए बैठी हूँ ,
देखूं मै क्या बोलूं मै क्या ?

यहाँ बोलने वाले कितने मुझे यहाँ जानने वाले कितने,
देखेंगे अंग्रेजी के आगे यहाँ मानने वाले कितने ?















~ प्रसनीत यादव ~

© PRASNEET YADAV
(prasneetyadav.blogspot.in)

20 Sep, 2013

Thursday, June 6, 2013

आज भी देह प्रदर्शन के बिना बनायी जा सकती है आकर्षक एवं बेहतरीन फ़िल्में

ये कहना कितना सहज हो गया है और हमें ये सुनने की आदत सी हो गयी है कि  फिल्मों में देह प्रदर्शन दर्शकों की मांग है उसके बिना फ़िल्में नहीं चल सकती। ऐसी विचारधारा जबरन हम पर थोपी जा रही है और हम उसे स्वीकार कर रहे है। क्यों न हो ऐसा पूरे समाज को एक जुट करके हमें "आम को  इमली" कहने पर मजबूर किया जा रहा है और हम असहाय की तरह न की जगह हाँ कह रहे है। क्या "हम साथ साथ हैं" जैसी पारिवारिक फिल्मों का फार्मुला आज नहीं चल सकता ? या फिर ऐसी फिल्मे जिसमे प्यार-मोहब्बत हो , रोना-धोना हो, थोड़ी मार धाड़ हो, थोड़ा हँसना-हँसाना हो, अच्छे गाने हों, जो किसी अच्छे विषय को लेकर बनी हो और जिसे हम पूरे परिवार के साथ बैठकर देख सकें  ?
ये जबरन हमें अँधेरे में रखने की कोशिश है। हम परदे पर वह देख रहे है जो सिर्फ हमें ही गंदा नहीं कर रहा हमारे-आपके बच्चों पर भी बुरा प्रभाव डाल रहा है। कौन है इसका जिम्मेदार ?
"जो दर्शक देखना चाहते है वो हम दिखाते हैं" ये कहना है आमतौर पर फिल्म निर्माताओं का, ये बात कहाँ तक सच है ? क्या फिल्म निर्माता फिल्म बनाने से पहले आपकी राय लेते है कि  कैसी फिल्म बनाएं ? या फिर इस बार के आइटम गाने में कौन सी अभिनेत्री का देह प्रदर्शन दिखाएँ ?
सच बात तो ये है जो हम देखना चाहते है वह बात अब सिनेमा में रह ही नहीं गयी। कुछ फिल्मों को छोड़कर अधिकतर फ़िल्में अब ऐसी है जिससे भारतीय सिनेमा का स्तर गिर रहा है। पूरी तरह से हमारा सिनेमा विषय विहीन होता जा रहा है। गंभीर मुद्दे फिल्मों से नदारद हो चुके है। साफ़ सुथरी फ़िल्में जिसे देखकर दिल और दिमाग में कोई गन्दगी नहीं होती थी वह सिनेमा अब विलुप्त
होने की कगार पर है।
क्या भविष्य उज्जवल होगा भारतीय सिनेमा का ? या अच्छी फिल्मों के आभाव में कोरी चकाचौंध ही चकाचौंध होगी सिर्फ ?
माँ , बाप , भाई, बहन  सब फिल्मों से अद्रश्य हो चुके है या हैं तो सिर्फ नाम मात्र क।े। मुख्य विषय तो सिर्फ नायक और नायिका के प्रेम संबंधों को कुछ अंत रंग द्रश्यों के साथ दिखाना रह गया है। जिसके दम पर फिल्म निर्माता फिल्म को सफल बनाना चाहते है। अब या तो हम बेवकूफ हैं जो ऐसी फिल्मों की सराहना करते हुए सिनेमा हाल तक जाते है और अपना वक़्त बर्बाद कर चले आते हैं या फिर वह जो ऐसा सोच कर फिल्म बनाते हैं।
कहानी लिखने का तजुर्बा न होने पर भी निर्माता निर्देशक अब खुद ही कहानी तैयार कर गरमा-गरम द्रश्यों की चटनी दर्शकों को चखाते हैं। जो हानिकारक है।  फिल्म में नायक और खलनायक के साथ साथ नायिका की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अफ़सोस अधिकतर फिल्मों में उन्हें सिर्फ देह प्रदर्शन के लिए रखा जाता है और तमाशा बनाकर सबके सामने पेश किया जाता है। फिल्म में काम करने वाली नायिकाओं को न चाहते हुए भी वह सब करना पड़ता है जो निर्माता, निर्देशक चाहते है।
फिल्म निर्माताओं ने फिल्म को मज़ाक बना कर रखा है। फिल्म का सही अर्थ भूल बैठे है वह या तो उन्हें पता ही नहीं। देह प्रदर्शन एक सीमा तक फिल्म की कहानी के हिसाब से उचित है नायिकाओं का तमाशा बनाने के हिसाब से नहीं। फिल्म में उनका चरित्र भी प्रेरणा देने वाला मज़बूत होना चाहिए।

गुज़रे दौर को याद करते हैं तो हम बहुत आगे निकल आये हैं। ६०,७०,८०,९० दशक कोई भी रहा हो हमने बेहतरीन से बेहतरीन फ़िल्में दी। आज वक़्त के साथ हमें बहुत अच्छी फिल्मे देनी चाहिए थी। मगर बड़ा अफ़सोस मजबूर है निर्माता अब पुरानी फिल्मों के रीमेक बनाने पर अपना सिनेमाई बाज़ार चलाने पर। न तो उनके पास ढंग की कोई कहानी है न गाने। हाँ दिखाने को कुछ रह गया है तो वह है देह प्रदर्शन जो मज़बूत भारतीय सिनेमा की कमजोर कड़ी है। एक छोटी सोंच है। नायिकाओं के साथ हो रहा गंदा खिलवाड़ है। सिनेमा को बाज़ार मानने वालों को इतना बता दूँ सिनेमा बाज़ार बाद में सबसे पहले एक आइना है जिसमे हम अपनी छवि देखते है। अपनी ज़िन्दगी की समस्याएं अपनी खुशियाँ देखते हैं ऐसे में अगर वह बातें हमें अब सिनेमा में नज़र नहीं आएँगी तो सिनेमा किस बात का ? वह तो सिर्फ शोहदों का अड्डा है जिसमे घर-परिवार, माँ-बाप, भाई-बहन का कोई नाम नहीं, न ही ऐसी फिल्मों में एक प्रेमी का प्रेमिका के प्रति कोई सम्मान । हाँ अगर कुछ है तो वह है देह प्रदर्शन जिसे प्रेमी अपनी प्रमिका में या दर्शक नायिकाओं में बुरी नियत से देखते है। ख़त्म करो यह नकारात्मक सोच किसी अच्छे विषय पर फिल्म बनाओ यकीन करो आज भी दर्शक उसे नकारेंगे नहीं दिल में जगह देंगे और फ़िल्में सुपर-डुपर हिट होंगी।

अंत मे एक शेर अर्ज़ कर रहा हूँ

"खुद हो गुमराह गुमराह हमें
करते हो,
भरना ना आए रंग तुम्हें
रंग भरते हो
करते हो ये क्या तुम ही जानो?
कहते कुछ दिखाते कुछ,
होता क्या बतलाते कुछ,
जाने ये कैसी चाह तुम ही जानो?"

~ प्रसनीत यादव ~  

मरता मिटता बालीवुड

सिनेमा पर्दे पर हम बहुत कुछ देखते हैं। सितारों के हँसते हुए रोते हुए चेहरे। उन पर फिल्माए गाने भी। वो अपने किरदार में जीते हैं और हम उनके किरदारों की ज़िन्दगी देखते हैं। उनकी अपनी असल ज़िन्दगी पर्दे के ठीक पीछे होती है। कितनी परेशानियों से गुज़रते होंगे वो कितना कुछ सहते होंगे वो ? कहते हैं न “जो जितना बर्दास्त करता है उतना आगे जाता है ” एक और फ़िल्मी सितारे का अंत दुःख हुआ मुझे, इसलिए नहीं की वो एक अभिनेत्री थी बल्कि इसलिए की मै एक इंसान हूँ और इसी समाज में रहता हूँ । ये मेरा कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं इसे वहां से दूर रखना। ये मेरी अपनी बात है बस ये कहना है ऐसी खबरें हमें झझकोर कर रख देती हैं, ऐसी घटनाएं हमें कुछ सोचने पर मजबूर करती हैं। ऐसा क्यों होता है जवाब दे सकते हो तो जरूर देना ? ये एक अभिनेत्री की मौत पर ज़िन्दगी और मौत का सबसे बड़ा सवाल है। इस घटना को सुनने के बाद चंद अल्फाज़ साझा कर रहा हूँ ….

सितारों की रोशनी में ये कैसा अन्धेरा ,
जाने कौन सा जहर पी रहा बालीवुड ,
न किसी का पता न खबर किसी की ,
जाने किस दौर में जी रहा बालीवुड ,
मौत न जाने कैसी है ये ?
मौत न जाने किसकी है ये ?
सिसकियाँ भरता आह समेटे ,
कहता न कुछ
होठों को अपने सी रहा बालीवुड ,
रात घनी अब अकेला है वो ,
थर थर काँपे डर के मारे ,
खोज में निकला अपने अतीत की ,
पल पल मरता मिटता ,
ज़िन्दगी अपनी खो रहा बालीवुड ,
होता है क्या क्या जहाँ-तहां में ,
पर्दा ही पर्दा रहता क्यों ?
देखो कितने बेदर्द तरह से
रो रहा बालीवुड,
ये मत कहना मुझसे तुम
मिला नया कुछ लिखने को फिर ,
शौक नहीं ये कहने का था ,
इन भावनाओं में बहने का था ,
चिता जली है फिर से कोई
और उठ रही आग की लपटें,
जिस पर सो रहा बालीवुड ,
पल पल मरता मिटता ….
सिसकियाँ भरता आह समेटे।

~ प्रसनीत यादव ~


    

Monday, May 6, 2013

सरबजीत की याद में

उसके रिहाई को  लेकर अक्सर खबर अखबार के फ्रंट पेज या फिर अन्दर के पन्नों पर जरूर होती थी। कौन था ये ? कहाँ का रहने वाला ? क्या कसूर था ? ये सारी बातें मुझे अखबार से पता चली। रट गया ये नाम अब तो। भीड़ में एक आवाज़ मेरी भी है उसे न्याय क्यों नहीं मिला ? या फिर कोशिश ही उचित ढंग से नहीं की गयी।
दो देशों के आपसी विवाद अपनी-अपनी न्याय व्यवस्था , नियम - कायदे। क्या वह कार्य करते है जो इंसानियत के पक्ष में हो या यह सिर्फ बदला निकालते है। सच कहूँ ये बटवारा खराब है जो हुआ।  जिस शांति और  समझौते के साथ एक देश को दो हिस्सों में बांटा गया परिणाम उल्टा हुआ, जंग शुरू हुई, कौमी दंगे हुए जो आज तक नहीं थमे और थमने का नाम भी नहीं ले रहे।

हमसे ठीक तो ये परिंदे कितने अच्छे है। इनकी न तो कोई सरहद है, न मज़हब है, न मंदिर, न मस्जिद बस जहाँ मन हुआ वहीँ बसेरा बना लिया। हम इंसान तो जिस जमीन के लिए लड़ रहे है वो इंसान की अपनी है ही नहीं।

माना की हम जी रहे है हक़ के लिए लड़ रहे है। हाँ हक़ के लिए लड़ना चाहिए क्युकी हम कमज़ोर होंगे तो जी नहीं सकेंगे और हमसे हमारा हक़ छिन जाएगा। लेकिन सवाल ये है क्या हक़ बदला लेकर मिल सकता है ?
मै  समझता हूँ इससे भड़ास निकल सकती है। एक दूसरे को नीचा दिखाया जा सकता है मगर सही मायनो में हक़ कभी नहीं मिल सकता चाहे ज़िन्दगी भर लड़ते हो। हाँ ऐसा करके हम पीठ पर छुरा जरुर चला रहे है।  युद्ध का भी नियम है वार सामने से होता है पीठ पीछे से नहीं। धोखे से नहीं।

हक़ की इस लड़ाई में हम तो हाँथ पर हाँथ धरकर बैठ जाते है दुसरा कोई छल कर जाता है। तब चौकन्ना होते है हम और कहते है ''अरे ये क्या हो गया''
वक़्त रहते चेत में आना जरुरी है। क्युकी बदला लेने वाला वो जिसकी अंतरात्मा, जिसकी भावना ही गन्दी है  फिर कुछ कर सकता है और करता रहेगा।
हम जैसा सोचते है जो हमारे दिल में होता है जरुरी नहीं सामने वाला हमसे जो कहे वही उसके भी दिल में हो। यहां खाने के दांत अलग और दिखाने के अलग होते है।

वो तो मिट गया धीरे धीरे उसका नाम अखबार, न्यूज़ चैनल्स से मिट जाएगा। कभी कभी राजनीतिक कारणों से आये वो अलग है और अगर उसके न्याय के हक़ के लिए आये तो अच्छी बात है। मोमबत्तियां बुझ जायेंगी भीड़ भी थम जायेगी। मगर उसकी जो दास्तां है , उसका नाम दिलों से कभी नहीं मिटेगा।
सवाल ये है मानवीय द्रष्टिकोण से इतनी यातनाएं सहने के बाद भी उसके साथ जो हुआ क्या होना चाहिए था ?
क्या उसका घर नहीं था ? बीवी बच्चे नहीं थे जैसे सबके होते है।
क्या इंसान ही इंसान पर ऐसी हुकूमत करने लगा की उसे कुछ वक़्त अपने घर में बिताने की अनुमति नहीं दे सका।
वाह रे हुकूमत वेल डन !
उसकी आत्मा को शांति मिले जो उसके साथ हुआ किसी के साथ न हो। उसके प्रति न्याय की जो उम्मीद बरकरार है वो न्याय उसको मिले। इसलिए नहीं की इससे वो जीवित होगा बल्कि इसलिए सही क्या है गलत क्या है ?दुनिया जान सके और इस बात का उन्हें भी एहसास हो जो इसके जिम्मेदार है।

~ Prasneet Yadav ~

  

Sunday, March 24, 2013

जनरल डिब्बा 24/March/2013

सफ़र कोई भी हो जनरल डिब्बे जैसा ही तो है। भीड़ से खचाखच भरा हुआ। मंजिल भीड़ से भरी हुई रास्तों पर लम्बी-लम्बी कतारें। पहले स्टूडेंट लाइफ में स्ट्रगल फिर कुछ बनने के लिए कुछ पाने के लिए स्ट्रगल। लाइफ का जनरल डिब्बा बैठना तो दूर खड़ा होना तक दुशवार है। अज़ी दो पैर क्या ? एक पैर तक ज़माना लोहे के चने चबाने जैसा है। बल्कि मै कहूँगा डिब्बे के अन्दर आकर दिखा दो, सर्दी में भी पसीने छूट जायेंगे।
भीड़ देखकर घबराओ नहीं बस डट जाओ। अगले स्टेशन तक अन्दर आ ही जाओगे और एक पैर जमा ही लोगे। धक्का फिर भी लगेगा मगर तुम हौसला मत छोडो जम गए हो तो जमे रहो फिर एक और स्टेशन तुम ठीक-ठाक खड़े हो जाओगे। आगे वाले लोग तुम्हे पीछे करने के लिए बार-बार धक्के पर धक्का देंगे। डरना मत अब तुम गिरोगे नहीं, वो जिस कतार में सबसे पीछे थे तुम अब आगे आ चुके हो। अब तुम्हे कुछ न होगा, भय तो उसे है जो अभी भी बहुत पीछे है। तुम थोड़ा आगे खिसकोगे थोड़ा पीछे। अगले आने वाले २-४ स्टेशन तक बस ये सिलसिला जारी रहेगा आगे-पीछे ,आगे पीछे। तुमने अगर पूरी निर्भयता और ताकत से उस भीड़ का सामना किया तो यकीनन एक स्टेशन ऐसा आएगा जहाँ तुम पूरी स्वतंत्रता खड़े हो जाओगे। यहाँ पर ये मत सोचना की डिब्बा बदल लूँ शायद कहीं बैठने की जगह मिल जाए। तुमने उस वक़्त ऐसा कुछ किया तो सोचो मुसीबतें फिर वही आएँगी जो तुम्हारे सफ़र के पहले स्टेशन से लेकर अब तक आ चुकी है।
तुम्हे ये सब भूल कर अपनी कोशिश जारी रखनी है। क्युकी, कोशिश नहीं करोगे तो वही खड़े रह जाओगे और पीछे वाला तुमसे आगे हो जाएगा। अभी भी शिकारी की तरह सारा ध्यान अपनी मंजिल पर रखो और जैसे ही आगे जगह खाली हो बिना चुके अपने पाँव जमा दो। धीरे-धीरे ट्रेन आगे बढ़ेगी स्टेशन ....स्टेशन फिर स्टेशन आते चले जायेंगे। जो सफ़र तुमने मुसीबतों से शुरू किया था अब आसान हो जाएगा। तुम्हारे निरंतर कोशिशों से एक स्टेशन ऐसा आयेगा जहाँ सीट जरुर खली होगी और तुम झट से वहां बैठ जाओगे। दोस्त उस वक़्त तुम खिड़की से बाहर झांकते हुए बहुत आराम महसूस करोगे। सुकून मिलेगा तुम्हे और आनंद भी। साथ ही साथ पहले स्टेशन के सफ़र से लेकर अब तक के सफ़र में आई सारी कठिनाइयों के बारे में तुम सोचोगे जरुर सोचोगे। फिर स्टेशन आयेंगे ....आयेंगे फिर आयेंगे। वो सारे मुसाफिर जिनको सफ़र नहीं करना एक - एक करके उतर जायेंगे। उस भीड़ से तुम बहुत आगे निकल चुके होगे। तुम्हारे लिए पूरी बर्थ खाली हो जायेगी और उस बर्थ पर तुम पूरे शान से लेट जाओगे जहाँ तक वो ट्रेन जायेगी और महसूस करोगे आई एम द बॉस।

~ Have A Great Day ~

~ Prasneet Yadav ~




Saturday, March 23, 2013

शहादत के नाम 23/March/2013

अंग्रेजी हुकूमत की एक और पहल एक और नाकाम कोशिश लाहौर में जुलूस और जलसे प्रदर्शन रोकने के लिए धारा -१४४ लागू कर दी गयी। भीड़ फिर भी ना थमी। वो एक ऐसा वक़्त था अंग्रेजों का अत्याचार जितना ज्यादा था, उससे कहीं ज्यादा उस अत्याचार से लड़ने का जोश जन-जन में था। जुबान पर एक ही नाम था भगत सिंह ....भगत सिंह ....भगत सिंह। गली गली इन्कलाब के नारे थे, जो तीर की तरह सीधे अंग्रेजों के काले दिलों को भेद सकते थे। वो आज़ादी का महानायक कोई साधारण नहीं  असाधारण व्यक्तित्व का धनी था। जोश था उसमे अपनी हुंकार से  अंग्रेजों की रूह हिला देने का।

३ मार्च १९३१ जब अमर शहीद अपनी से माँ से मिले उनके शब्द थे -" आप लोग मेरी मौत का शोक मत करना, एक भगत सिंह मरेगा लाखों पैदा होंगे, बेबेजी (माता जी ) मेरी लाश लेने मत आना। कुलबीर को भेजना,  मै नहीं चाहता आपकी आँखों में आंसू हों और लोग कहें देखो भगत सिंह की माँ रो रही है, अपने आंसू बहाकर मेरी आत्मा को तकलीफ मत देना।"

जन-जन की आँखें भगत सिंह पर टिकी थी और दिलों में अंग्रेजों के खिलाफ सुलगती आग थी।
२३ मार्च १९३१ सारे कैदी अपने अपने बैरिकों में बंद थे। चारों तरफ अजीब सन्नाटा हवा डरावनी सी बह रही थी, मौसम में अजीब घुटन थी। उस दिन भगत सिंह ने अपनी ज़िन्दगी के २३ साल, ५ माह, २६ दिन पूरे किये थे।
उन्होंने वो किया था जो आजीवन शायद ही कोई कर  पाता। गुपचुप तरीके से फांसी का फरमान जारी हुआ और थोड़ी देर में फांसी की खबर उनके कानो तक आ पहुंची।  अंतिम वक़्त उनके हांथों में उनकी प्यारी लेनिन की पुस्तक थी, मुस्कुराते हुए उन्होंने पुस्तक के अंतिम पन्ने को पढ़ा और ज़ज्बे के साथ पुस्तक चूमते हुए उसे बंद कर उठ खड़े हुए। बैरिकों में कैद सारे कैदी रो रहे थे।  यहाँ तक जेलर  खान भी अपने आंसुओं को न रोक सका।
तीनो साथी भगत सिंह, सुखदेव , राजगुरु शान से मुस्कुराते हुए गले लग रहे थे। जैसे इसी दिन का उन्हें बेसब्री से इंतज़ार हो। तीनो एक ही  स्वर में बोल उठे -

                                           "दिल से न निकलेगी वतन की उल्फत ,
                                             हमारी मिट्टी से भी खुशबू -ए -वतन आएगी"

शेरों की तरह उनके हाँथ खुले  हुए थे। सामने अंग्रेज़ डी . सी . खड़ा था। भगत सिंह बोले - "डी . सी . साहब आप बहुत भाग्यशाली है जो अपनी आँखों से आज तीन  क्रांतिकारियों को फांसी के तख्ते पर शहीद होते देख रहे है "

डी . सी . उन तीनो के को देख रहा था जिनके चेहरों पर निराशा का नामोनिशान तक नहीं थी और न कोई गम।
शाम ७ बजकर ३३ मिनट तीनो गर्व से फांसी पर झूल गए।

अंग्रेजों ने अपनी बर्बरता फिर भी ना थामी। उनके शवों को रातो-रात काटकर बोरे में भरकर एक ट्रक द्वारा लाहौर से फिरोजपुर के पास सतलुज नदी के किनारे जला दिया।
जेल के बाहर बैठी जो भीड़ उनके शवों का इंतज़ार कर रही थी। दूसरे दिन यह खबर सुनकर भड़क उठी। एक मातम था हिन्दुस्तान में। जालिम अंग्रेजों के खिलाफ जो जंग छिड़ी थी उसमे आग ही आग थी। दंगे शुरू थे।
ना जाने कितने अंग्रेजों को उसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।
मर कर भी जिसका असर कम न हुआ  बल्कि दुगुना हो गया - वो था शहीद क्रांतिकारी भगत सिंह। जो जिंदादिल था जिसकी आँखों में देश के लिए सुनहरे सपने थे। जो यह  सोचता था एक भगत सिंह मरेगा लाख पैदा होंगे। मगर अफ़सोस उसके जैसा एक भी नहीं।
क्या हिन्दुस्तान है ये क्या हिन्दुस्तान था वो ? जहाँ भगत सिंह ने जन्म लिया था जहाँ मौत को उसने हंसकर गले लगाया था। कसम खायी थी गुलाम बनकर न रहने की न अंग्रेजों के अत्याचार सहने की।

जब आज के हिन्दुस्तान की तस्वीर उसकी अमर आत्मा देखती होगी- जहाँ हर बड़े से छोटा करप्ट हो चुका है,
जहाँ गली गली लडकियां सुरक्षित नहीं। जहाँ भारत की संस्कृति अब गन्दी मानसिकता में  तब्दील हो चुकी है। जहाँ शर्म लिहाज़ का कोई नाम नहीं है। तो वो खुद से सवाल करती होगी। क्या भगत सिंह के शहादत की कीमत सिर्फ इतनी है ?
मगर नहीं उसकी आत्मा उसकी तरह जिंदादिल है। आज वो जो कर गया कोई सात जन्म लेकर भी नहीं कर सकता। भगत सिंह सिर्फ एक है उसका स्थान कोई नहीं ले सकता। आइये हम सब मिलकर आज शाम थोड़ी देर के लिए अपनी आँखें बंद कर उन तीन शहीदों को याद करें, वो जो कर गए वो तो बहुत था, क्या हम उनके लिए इतना नहीं कर सकते ?  यकीन मानिये हमारी सच्ची श्रधांजलि उनकी आत्मा को गहरा सुकून  देगी। उन तीनो का शहीद होना व्यर्थ न होगा शहादत फिर से जी उठेगी दिल दिल से आवाज़ आएगी शेर के दहाड़ की तरह - क्युकी जरुरत थी हमें इन शब्दों की कल भी आज भी और हमेशा रहेगी -

                                            "सरफरोशी की तमन्ना आज भी हमारे दिल में है,
                                              देखना है जोर कितना बाजु-ए -कातिल में है "

जी हाँ, कल तक हम अंग्रेजों से लड़ते थे उनकी हुकूमत से लड़ रहे थे, आज अत्याचारियों उनके अपराधों से लड़ रहे है, और ये जंग ख़त्म न होगी जारी रहेगी ....

~ इन्कलाब जिंदाबाद ~

~ Prasneet Yadav ~