Sunday, March 24, 2013

जनरल डिब्बा 24/March/2013

सफ़र कोई भी हो जनरल डिब्बे जैसा ही तो है। भीड़ से खचाखच भरा हुआ। मंजिल भीड़ से भरी हुई रास्तों पर लम्बी-लम्बी कतारें। पहले स्टूडेंट लाइफ में स्ट्रगल फिर कुछ बनने के लिए कुछ पाने के लिए स्ट्रगल। लाइफ का जनरल डिब्बा बैठना तो दूर खड़ा होना तक दुशवार है। अज़ी दो पैर क्या ? एक पैर तक ज़माना लोहे के चने चबाने जैसा है। बल्कि मै कहूँगा डिब्बे के अन्दर आकर दिखा दो, सर्दी में भी पसीने छूट जायेंगे।
भीड़ देखकर घबराओ नहीं बस डट जाओ। अगले स्टेशन तक अन्दर आ ही जाओगे और एक पैर जमा ही लोगे। धक्का फिर भी लगेगा मगर तुम हौसला मत छोडो जम गए हो तो जमे रहो फिर एक और स्टेशन तुम ठीक-ठाक खड़े हो जाओगे। आगे वाले लोग तुम्हे पीछे करने के लिए बार-बार धक्के पर धक्का देंगे। डरना मत अब तुम गिरोगे नहीं, वो जिस कतार में सबसे पीछे थे तुम अब आगे आ चुके हो। अब तुम्हे कुछ न होगा, भय तो उसे है जो अभी भी बहुत पीछे है। तुम थोड़ा आगे खिसकोगे थोड़ा पीछे। अगले आने वाले २-४ स्टेशन तक बस ये सिलसिला जारी रहेगा आगे-पीछे ,आगे पीछे। तुमने अगर पूरी निर्भयता और ताकत से उस भीड़ का सामना किया तो यकीनन एक स्टेशन ऐसा आएगा जहाँ तुम पूरी स्वतंत्रता खड़े हो जाओगे। यहाँ पर ये मत सोचना की डिब्बा बदल लूँ शायद कहीं बैठने की जगह मिल जाए। तुमने उस वक़्त ऐसा कुछ किया तो सोचो मुसीबतें फिर वही आएँगी जो तुम्हारे सफ़र के पहले स्टेशन से लेकर अब तक आ चुकी है।
तुम्हे ये सब भूल कर अपनी कोशिश जारी रखनी है। क्युकी, कोशिश नहीं करोगे तो वही खड़े रह जाओगे और पीछे वाला तुमसे आगे हो जाएगा। अभी भी शिकारी की तरह सारा ध्यान अपनी मंजिल पर रखो और जैसे ही आगे जगह खाली हो बिना चुके अपने पाँव जमा दो। धीरे-धीरे ट्रेन आगे बढ़ेगी स्टेशन ....स्टेशन फिर स्टेशन आते चले जायेंगे। जो सफ़र तुमने मुसीबतों से शुरू किया था अब आसान हो जाएगा। तुम्हारे निरंतर कोशिशों से एक स्टेशन ऐसा आयेगा जहाँ सीट जरुर खली होगी और तुम झट से वहां बैठ जाओगे। दोस्त उस वक़्त तुम खिड़की से बाहर झांकते हुए बहुत आराम महसूस करोगे। सुकून मिलेगा तुम्हे और आनंद भी। साथ ही साथ पहले स्टेशन के सफ़र से लेकर अब तक के सफ़र में आई सारी कठिनाइयों के बारे में तुम सोचोगे जरुर सोचोगे। फिर स्टेशन आयेंगे ....आयेंगे फिर आयेंगे। वो सारे मुसाफिर जिनको सफ़र नहीं करना एक - एक करके उतर जायेंगे। उस भीड़ से तुम बहुत आगे निकल चुके होगे। तुम्हारे लिए पूरी बर्थ खाली हो जायेगी और उस बर्थ पर तुम पूरे शान से लेट जाओगे जहाँ तक वो ट्रेन जायेगी और महसूस करोगे आई एम द बॉस।

~ Have A Great Day ~

~ Prasneet Yadav ~




Saturday, March 23, 2013

शहादत के नाम 23/March/2013

अंग्रेजी हुकूमत की एक और पहल एक और नाकाम कोशिश लाहौर में जुलूस और जलसे प्रदर्शन रोकने के लिए धारा -१४४ लागू कर दी गयी। भीड़ फिर भी ना थमी। वो एक ऐसा वक़्त था अंग्रेजों का अत्याचार जितना ज्यादा था, उससे कहीं ज्यादा उस अत्याचार से लड़ने का जोश जन-जन में था। जुबान पर एक ही नाम था भगत सिंह ....भगत सिंह ....भगत सिंह। गली गली इन्कलाब के नारे थे, जो तीर की तरह सीधे अंग्रेजों के काले दिलों को भेद सकते थे। वो आज़ादी का महानायक कोई साधारण नहीं  असाधारण व्यक्तित्व का धनी था। जोश था उसमे अपनी हुंकार से  अंग्रेजों की रूह हिला देने का।

३ मार्च १९३१ जब अमर शहीद अपनी से माँ से मिले उनके शब्द थे -" आप लोग मेरी मौत का शोक मत करना, एक भगत सिंह मरेगा लाखों पैदा होंगे, बेबेजी (माता जी ) मेरी लाश लेने मत आना। कुलबीर को भेजना,  मै नहीं चाहता आपकी आँखों में आंसू हों और लोग कहें देखो भगत सिंह की माँ रो रही है, अपने आंसू बहाकर मेरी आत्मा को तकलीफ मत देना।"

जन-जन की आँखें भगत सिंह पर टिकी थी और दिलों में अंग्रेजों के खिलाफ सुलगती आग थी।
२३ मार्च १९३१ सारे कैदी अपने अपने बैरिकों में बंद थे। चारों तरफ अजीब सन्नाटा हवा डरावनी सी बह रही थी, मौसम में अजीब घुटन थी। उस दिन भगत सिंह ने अपनी ज़िन्दगी के २३ साल, ५ माह, २६ दिन पूरे किये थे।
उन्होंने वो किया था जो आजीवन शायद ही कोई कर  पाता। गुपचुप तरीके से फांसी का फरमान जारी हुआ और थोड़ी देर में फांसी की खबर उनके कानो तक आ पहुंची।  अंतिम वक़्त उनके हांथों में उनकी प्यारी लेनिन की पुस्तक थी, मुस्कुराते हुए उन्होंने पुस्तक के अंतिम पन्ने को पढ़ा और ज़ज्बे के साथ पुस्तक चूमते हुए उसे बंद कर उठ खड़े हुए। बैरिकों में कैद सारे कैदी रो रहे थे।  यहाँ तक जेलर  खान भी अपने आंसुओं को न रोक सका।
तीनो साथी भगत सिंह, सुखदेव , राजगुरु शान से मुस्कुराते हुए गले लग रहे थे। जैसे इसी दिन का उन्हें बेसब्री से इंतज़ार हो। तीनो एक ही  स्वर में बोल उठे -

                                           "दिल से न निकलेगी वतन की उल्फत ,
                                             हमारी मिट्टी से भी खुशबू -ए -वतन आएगी"

शेरों की तरह उनके हाँथ खुले  हुए थे। सामने अंग्रेज़ डी . सी . खड़ा था। भगत सिंह बोले - "डी . सी . साहब आप बहुत भाग्यशाली है जो अपनी आँखों से आज तीन  क्रांतिकारियों को फांसी के तख्ते पर शहीद होते देख रहे है "

डी . सी . उन तीनो के को देख रहा था जिनके चेहरों पर निराशा का नामोनिशान तक नहीं थी और न कोई गम।
शाम ७ बजकर ३३ मिनट तीनो गर्व से फांसी पर झूल गए।

अंग्रेजों ने अपनी बर्बरता फिर भी ना थामी। उनके शवों को रातो-रात काटकर बोरे में भरकर एक ट्रक द्वारा लाहौर से फिरोजपुर के पास सतलुज नदी के किनारे जला दिया।
जेल के बाहर बैठी जो भीड़ उनके शवों का इंतज़ार कर रही थी। दूसरे दिन यह खबर सुनकर भड़क उठी। एक मातम था हिन्दुस्तान में। जालिम अंग्रेजों के खिलाफ जो जंग छिड़ी थी उसमे आग ही आग थी। दंगे शुरू थे।
ना जाने कितने अंग्रेजों को उसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।
मर कर भी जिसका असर कम न हुआ  बल्कि दुगुना हो गया - वो था शहीद क्रांतिकारी भगत सिंह। जो जिंदादिल था जिसकी आँखों में देश के लिए सुनहरे सपने थे। जो यह  सोचता था एक भगत सिंह मरेगा लाख पैदा होंगे। मगर अफ़सोस उसके जैसा एक भी नहीं।
क्या हिन्दुस्तान है ये क्या हिन्दुस्तान था वो ? जहाँ भगत सिंह ने जन्म लिया था जहाँ मौत को उसने हंसकर गले लगाया था। कसम खायी थी गुलाम बनकर न रहने की न अंग्रेजों के अत्याचार सहने की।

जब आज के हिन्दुस्तान की तस्वीर उसकी अमर आत्मा देखती होगी- जहाँ हर बड़े से छोटा करप्ट हो चुका है,
जहाँ गली गली लडकियां सुरक्षित नहीं। जहाँ भारत की संस्कृति अब गन्दी मानसिकता में  तब्दील हो चुकी है। जहाँ शर्म लिहाज़ का कोई नाम नहीं है। तो वो खुद से सवाल करती होगी। क्या भगत सिंह के शहादत की कीमत सिर्फ इतनी है ?
मगर नहीं उसकी आत्मा उसकी तरह जिंदादिल है। आज वो जो कर गया कोई सात जन्म लेकर भी नहीं कर सकता। भगत सिंह सिर्फ एक है उसका स्थान कोई नहीं ले सकता। आइये हम सब मिलकर आज शाम थोड़ी देर के लिए अपनी आँखें बंद कर उन तीन शहीदों को याद करें, वो जो कर गए वो तो बहुत था, क्या हम उनके लिए इतना नहीं कर सकते ?  यकीन मानिये हमारी सच्ची श्रधांजलि उनकी आत्मा को गहरा सुकून  देगी। उन तीनो का शहीद होना व्यर्थ न होगा शहादत फिर से जी उठेगी दिल दिल से आवाज़ आएगी शेर के दहाड़ की तरह - क्युकी जरुरत थी हमें इन शब्दों की कल भी आज भी और हमेशा रहेगी -

                                            "सरफरोशी की तमन्ना आज भी हमारे दिल में है,
                                              देखना है जोर कितना बाजु-ए -कातिल में है "

जी हाँ, कल तक हम अंग्रेजों से लड़ते थे उनकी हुकूमत से लड़ रहे थे, आज अत्याचारियों उनके अपराधों से लड़ रहे है, और ये जंग ख़त्म न होगी जारी रहेगी ....

~ इन्कलाब जिंदाबाद ~

~ Prasneet Yadav ~