उसके रिहाई को लेकर अक्सर खबर अखबार के फ्रंट पेज या फिर अन्दर के पन्नों पर जरूर होती थी। कौन था ये ? कहाँ का रहने वाला ? क्या कसूर था ? ये सारी बातें मुझे अखबार से पता चली। रट गया ये नाम अब तो। भीड़ में एक आवाज़ मेरी भी है उसे न्याय क्यों नहीं मिला ? या फिर कोशिश ही उचित ढंग से नहीं की गयी।
दो देशों के आपसी विवाद अपनी-अपनी न्याय व्यवस्था , नियम - कायदे। क्या वह कार्य करते है जो इंसानियत के पक्ष में हो या यह सिर्फ बदला निकालते है। सच कहूँ ये बटवारा खराब है जो हुआ। जिस शांति और समझौते के साथ एक देश को दो हिस्सों में बांटा गया परिणाम उल्टा हुआ, जंग शुरू हुई, कौमी दंगे हुए जो आज तक नहीं थमे और थमने का नाम भी नहीं ले रहे।
हमसे ठीक तो ये परिंदे कितने अच्छे है। इनकी न तो कोई सरहद है, न मज़हब है, न मंदिर, न मस्जिद बस जहाँ मन हुआ वहीँ बसेरा बना लिया। हम इंसान तो जिस जमीन के लिए लड़ रहे है वो इंसान की अपनी है ही नहीं।
माना की हम जी रहे है हक़ के लिए लड़ रहे है। हाँ हक़ के लिए लड़ना चाहिए क्युकी हम कमज़ोर होंगे तो जी नहीं सकेंगे और हमसे हमारा हक़ छिन जाएगा। लेकिन सवाल ये है क्या हक़ बदला लेकर मिल सकता है ?
मै समझता हूँ इससे भड़ास निकल सकती है। एक दूसरे को नीचा दिखाया जा सकता है मगर सही मायनो में हक़ कभी नहीं मिल सकता चाहे ज़िन्दगी भर लड़ते हो। हाँ ऐसा करके हम पीठ पर छुरा जरुर चला रहे है। युद्ध का भी नियम है वार सामने से होता है पीठ पीछे से नहीं। धोखे से नहीं।
हक़ की इस लड़ाई में हम तो हाँथ पर हाँथ धरकर बैठ जाते है दुसरा कोई छल कर जाता है। तब चौकन्ना होते है हम और कहते है ''अरे ये क्या हो गया''
वक़्त रहते चेत में आना जरुरी है। क्युकी बदला लेने वाला वो जिसकी अंतरात्मा, जिसकी भावना ही गन्दी है फिर कुछ कर सकता है और करता रहेगा।
हम जैसा सोचते है जो हमारे दिल में होता है जरुरी नहीं सामने वाला हमसे जो कहे वही उसके भी दिल में हो। यहां खाने के दांत अलग और दिखाने के अलग होते है।
वो तो मिट गया धीरे धीरे उसका नाम अखबार, न्यूज़ चैनल्स से मिट जाएगा। कभी कभी राजनीतिक कारणों से आये वो अलग है और अगर उसके न्याय के हक़ के लिए आये तो अच्छी बात है। मोमबत्तियां बुझ जायेंगी भीड़ भी थम जायेगी। मगर उसकी जो दास्तां है , उसका नाम दिलों से कभी नहीं मिटेगा।
सवाल ये है मानवीय द्रष्टिकोण से इतनी यातनाएं सहने के बाद भी उसके साथ जो हुआ क्या होना चाहिए था ?
क्या उसका घर नहीं था ? बीवी बच्चे नहीं थे जैसे सबके होते है।
क्या इंसान ही इंसान पर ऐसी हुकूमत करने लगा की उसे कुछ वक़्त अपने घर में बिताने की अनुमति नहीं दे सका।
वाह रे हुकूमत वेल डन !
उसकी आत्मा को शांति मिले जो उसके साथ हुआ किसी के साथ न हो। उसके प्रति न्याय की जो उम्मीद बरकरार है वो न्याय उसको मिले। इसलिए नहीं की इससे वो जीवित होगा बल्कि इसलिए सही क्या है गलत क्या है ?दुनिया जान सके और इस बात का उन्हें भी एहसास हो जो इसके जिम्मेदार है।
~ Prasneet Yadav ~
दो देशों के आपसी विवाद अपनी-अपनी न्याय व्यवस्था , नियम - कायदे। क्या वह कार्य करते है जो इंसानियत के पक्ष में हो या यह सिर्फ बदला निकालते है। सच कहूँ ये बटवारा खराब है जो हुआ। जिस शांति और समझौते के साथ एक देश को दो हिस्सों में बांटा गया परिणाम उल्टा हुआ, जंग शुरू हुई, कौमी दंगे हुए जो आज तक नहीं थमे और थमने का नाम भी नहीं ले रहे।
हमसे ठीक तो ये परिंदे कितने अच्छे है। इनकी न तो कोई सरहद है, न मज़हब है, न मंदिर, न मस्जिद बस जहाँ मन हुआ वहीँ बसेरा बना लिया। हम इंसान तो जिस जमीन के लिए लड़ रहे है वो इंसान की अपनी है ही नहीं।
माना की हम जी रहे है हक़ के लिए लड़ रहे है। हाँ हक़ के लिए लड़ना चाहिए क्युकी हम कमज़ोर होंगे तो जी नहीं सकेंगे और हमसे हमारा हक़ छिन जाएगा। लेकिन सवाल ये है क्या हक़ बदला लेकर मिल सकता है ?
मै समझता हूँ इससे भड़ास निकल सकती है। एक दूसरे को नीचा दिखाया जा सकता है मगर सही मायनो में हक़ कभी नहीं मिल सकता चाहे ज़िन्दगी भर लड़ते हो। हाँ ऐसा करके हम पीठ पर छुरा जरुर चला रहे है। युद्ध का भी नियम है वार सामने से होता है पीठ पीछे से नहीं। धोखे से नहीं।
हक़ की इस लड़ाई में हम तो हाँथ पर हाँथ धरकर बैठ जाते है दुसरा कोई छल कर जाता है। तब चौकन्ना होते है हम और कहते है ''अरे ये क्या हो गया''
वक़्त रहते चेत में आना जरुरी है। क्युकी बदला लेने वाला वो जिसकी अंतरात्मा, जिसकी भावना ही गन्दी है फिर कुछ कर सकता है और करता रहेगा।
हम जैसा सोचते है जो हमारे दिल में होता है जरुरी नहीं सामने वाला हमसे जो कहे वही उसके भी दिल में हो। यहां खाने के दांत अलग और दिखाने के अलग होते है।
वो तो मिट गया धीरे धीरे उसका नाम अखबार, न्यूज़ चैनल्स से मिट जाएगा। कभी कभी राजनीतिक कारणों से आये वो अलग है और अगर उसके न्याय के हक़ के लिए आये तो अच्छी बात है। मोमबत्तियां बुझ जायेंगी भीड़ भी थम जायेगी। मगर उसकी जो दास्तां है , उसका नाम दिलों से कभी नहीं मिटेगा।
सवाल ये है मानवीय द्रष्टिकोण से इतनी यातनाएं सहने के बाद भी उसके साथ जो हुआ क्या होना चाहिए था ?
क्या उसका घर नहीं था ? बीवी बच्चे नहीं थे जैसे सबके होते है।
क्या इंसान ही इंसान पर ऐसी हुकूमत करने लगा की उसे कुछ वक़्त अपने घर में बिताने की अनुमति नहीं दे सका।
वाह रे हुकूमत वेल डन !
उसकी आत्मा को शांति मिले जो उसके साथ हुआ किसी के साथ न हो। उसके प्रति न्याय की जो उम्मीद बरकरार है वो न्याय उसको मिले। इसलिए नहीं की इससे वो जीवित होगा बल्कि इसलिए सही क्या है गलत क्या है ?दुनिया जान सके और इस बात का उन्हें भी एहसास हो जो इसके जिम्मेदार है।
~ Prasneet Yadav ~