Friday, September 20, 2013

हिंदी मेरे देश की हिंदी और ए बी सी डी ई एफ जी

हिंदी मेरे देश की हिंदी दिन-दिन घटती जाए ,
हिंदी के इस देश में अंग्रेजी राज़ चलाये ,
अंग्रेजी में होय आरती अब अंग्रेजी के होते बोल,
हिंदी तो बस नाम की हिंदी जिसका न कोई मोल….

तोते रटे रटाये जाते अंग्रेजी सिखलाये जाते ,
ए बी सी डी ई एफ जी बस यही यहाँ बतलाये जाते ,
क्या पढेंगे अब हम क ख ग ?
जब आती हमें शर्म
अंग्रेजी की गरमा गर्मी हिंदी हुई नरम….

हिंदी मेरे देश की हिंदी अपने घाव दिखाए ,
तड़प-तड़प के बोले वो क्या ?
सुनना न चाहे कोई हिंदी ,
कहना न चाहे कोई हिंदी ….

अंग्रेजी की मारा-मारी अंग्रेजी की भागम-भागी
हुए यहाँ गुमराह सभी
हिंदी दिए भुलाए ,
दिए जालाये चौखट पर हिंदी अब इंतज़ार करे ,
हैरान होकर बोले वो कोई तो मुझसे प्यार करे ….

ए बी सी डी ई एफ जी में आया कितना दम ,
हिंदी हुई नरम बाबू हिंदी हुई नरम ,
हिंदी की क्लास से अब बच्चे गायब रहते है ,
आता हमको सब कुछ है बाहर वो ऐसा कहते है….

हिंदी से इतना भाग रहे देखो दुश्मन जाग रहे ,
अंग्रेजी ने मारा सबको अंग्रेजी में ढाला सबको ,
हिंदी हुई हमारी बैरी आती नहीं शर्म ?
हिंदी मेरे देश की हिंदी दिन-दिन मिटती जाए ,
अपनों के हांथों लुटती जाए ….

पराये देशों में पा रही सम्मान ,
अफ़सोस अपने ही देश में मिल रहा अपमान,
क्या लिखकर अब हासिल करे हिंदी का दर्द ?
हिंदी हुई बेवफा सबकी अंग्रेजी बनी सनम….

ए बी सी डी ई एफ जी सर पर इसे बिठाया हमने
चकाचौंध की नगरी में जगह-जगह सजाया हमने,
हमने ही भाव-ताव बढाए इसके ,
अंग्रेजी हिंदी पर भारी इस पर आया बड़ा वजन….

हिंदी मेरे देश की हिंदी ये मुद्दा बड़ा गरम,
कहती हिंदी ऐसा कुछ आई हूँ लौटकर एक आस लगाए बैठी हूँ ,
प्यासी हूँ मै फिर भी प्यास बुझाए बैठी हूँ ,
देखूं मै क्या बोलूं मै क्या ?

यहाँ बोलने वाले कितने मुझे यहाँ जानने वाले कितने,
देखेंगे अंग्रेजी के आगे यहाँ मानने वाले कितने ?















~ प्रसनीत यादव ~

© PRASNEET YADAV
(prasneetyadav.blogspot.in)

20 Sep, 2013