Thursday, June 6, 2013

आज भी देह प्रदर्शन के बिना बनायी जा सकती है आकर्षक एवं बेहतरीन फ़िल्में

ये कहना कितना सहज हो गया है और हमें ये सुनने की आदत सी हो गयी है कि  फिल्मों में देह प्रदर्शन दर्शकों की मांग है उसके बिना फ़िल्में नहीं चल सकती। ऐसी विचारधारा जबरन हम पर थोपी जा रही है और हम उसे स्वीकार कर रहे है। क्यों न हो ऐसा पूरे समाज को एक जुट करके हमें "आम को  इमली" कहने पर मजबूर किया जा रहा है और हम असहाय की तरह न की जगह हाँ कह रहे है। क्या "हम साथ साथ हैं" जैसी पारिवारिक फिल्मों का फार्मुला आज नहीं चल सकता ? या फिर ऐसी फिल्मे जिसमे प्यार-मोहब्बत हो , रोना-धोना हो, थोड़ी मार धाड़ हो, थोड़ा हँसना-हँसाना हो, अच्छे गाने हों, जो किसी अच्छे विषय को लेकर बनी हो और जिसे हम पूरे परिवार के साथ बैठकर देख सकें  ?
ये जबरन हमें अँधेरे में रखने की कोशिश है। हम परदे पर वह देख रहे है जो सिर्फ हमें ही गंदा नहीं कर रहा हमारे-आपके बच्चों पर भी बुरा प्रभाव डाल रहा है। कौन है इसका जिम्मेदार ?
"जो दर्शक देखना चाहते है वो हम दिखाते हैं" ये कहना है आमतौर पर फिल्म निर्माताओं का, ये बात कहाँ तक सच है ? क्या फिल्म निर्माता फिल्म बनाने से पहले आपकी राय लेते है कि  कैसी फिल्म बनाएं ? या फिर इस बार के आइटम गाने में कौन सी अभिनेत्री का देह प्रदर्शन दिखाएँ ?
सच बात तो ये है जो हम देखना चाहते है वह बात अब सिनेमा में रह ही नहीं गयी। कुछ फिल्मों को छोड़कर अधिकतर फ़िल्में अब ऐसी है जिससे भारतीय सिनेमा का स्तर गिर रहा है। पूरी तरह से हमारा सिनेमा विषय विहीन होता जा रहा है। गंभीर मुद्दे फिल्मों से नदारद हो चुके है। साफ़ सुथरी फ़िल्में जिसे देखकर दिल और दिमाग में कोई गन्दगी नहीं होती थी वह सिनेमा अब विलुप्त
होने की कगार पर है।
क्या भविष्य उज्जवल होगा भारतीय सिनेमा का ? या अच्छी फिल्मों के आभाव में कोरी चकाचौंध ही चकाचौंध होगी सिर्फ ?
माँ , बाप , भाई, बहन  सब फिल्मों से अद्रश्य हो चुके है या हैं तो सिर्फ नाम मात्र क।े। मुख्य विषय तो सिर्फ नायक और नायिका के प्रेम संबंधों को कुछ अंत रंग द्रश्यों के साथ दिखाना रह गया है। जिसके दम पर फिल्म निर्माता फिल्म को सफल बनाना चाहते है। अब या तो हम बेवकूफ हैं जो ऐसी फिल्मों की सराहना करते हुए सिनेमा हाल तक जाते है और अपना वक़्त बर्बाद कर चले आते हैं या फिर वह जो ऐसा सोच कर फिल्म बनाते हैं।
कहानी लिखने का तजुर्बा न होने पर भी निर्माता निर्देशक अब खुद ही कहानी तैयार कर गरमा-गरम द्रश्यों की चटनी दर्शकों को चखाते हैं। जो हानिकारक है।  फिल्म में नायक और खलनायक के साथ साथ नायिका की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अफ़सोस अधिकतर फिल्मों में उन्हें सिर्फ देह प्रदर्शन के लिए रखा जाता है और तमाशा बनाकर सबके सामने पेश किया जाता है। फिल्म में काम करने वाली नायिकाओं को न चाहते हुए भी वह सब करना पड़ता है जो निर्माता, निर्देशक चाहते है।
फिल्म निर्माताओं ने फिल्म को मज़ाक बना कर रखा है। फिल्म का सही अर्थ भूल बैठे है वह या तो उन्हें पता ही नहीं। देह प्रदर्शन एक सीमा तक फिल्म की कहानी के हिसाब से उचित है नायिकाओं का तमाशा बनाने के हिसाब से नहीं। फिल्म में उनका चरित्र भी प्रेरणा देने वाला मज़बूत होना चाहिए।

गुज़रे दौर को याद करते हैं तो हम बहुत आगे निकल आये हैं। ६०,७०,८०,९० दशक कोई भी रहा हो हमने बेहतरीन से बेहतरीन फ़िल्में दी। आज वक़्त के साथ हमें बहुत अच्छी फिल्मे देनी चाहिए थी। मगर बड़ा अफ़सोस मजबूर है निर्माता अब पुरानी फिल्मों के रीमेक बनाने पर अपना सिनेमाई बाज़ार चलाने पर। न तो उनके पास ढंग की कोई कहानी है न गाने। हाँ दिखाने को कुछ रह गया है तो वह है देह प्रदर्शन जो मज़बूत भारतीय सिनेमा की कमजोर कड़ी है। एक छोटी सोंच है। नायिकाओं के साथ हो रहा गंदा खिलवाड़ है। सिनेमा को बाज़ार मानने वालों को इतना बता दूँ सिनेमा बाज़ार बाद में सबसे पहले एक आइना है जिसमे हम अपनी छवि देखते है। अपनी ज़िन्दगी की समस्याएं अपनी खुशियाँ देखते हैं ऐसे में अगर वह बातें हमें अब सिनेमा में नज़र नहीं आएँगी तो सिनेमा किस बात का ? वह तो सिर्फ शोहदों का अड्डा है जिसमे घर-परिवार, माँ-बाप, भाई-बहन का कोई नाम नहीं, न ही ऐसी फिल्मों में एक प्रेमी का प्रेमिका के प्रति कोई सम्मान । हाँ अगर कुछ है तो वह है देह प्रदर्शन जिसे प्रेमी अपनी प्रमिका में या दर्शक नायिकाओं में बुरी नियत से देखते है। ख़त्म करो यह नकारात्मक सोच किसी अच्छे विषय पर फिल्म बनाओ यकीन करो आज भी दर्शक उसे नकारेंगे नहीं दिल में जगह देंगे और फ़िल्में सुपर-डुपर हिट होंगी।

अंत मे एक शेर अर्ज़ कर रहा हूँ

"खुद हो गुमराह गुमराह हमें
करते हो,
भरना ना आए रंग तुम्हें
रंग भरते हो
करते हो ये क्या तुम ही जानो?
कहते कुछ दिखाते कुछ,
होता क्या बतलाते कुछ,
जाने ये कैसी चाह तुम ही जानो?"

~ प्रसनीत यादव ~  

4 comments:

  1. बेहद सार्थक पोस्ट | सटीक लेख और स्वच्छ विचारधारा | आभार

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    1. thnx A Lot Tushar ....
      n Aapka Blog Follow Ho Gaya :) :)

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  2. bahut khub prasneet!! bahut sadhi hui & sarthk baat kahi hai tumne..! naitikta ab nhi rhi & pradarshan hawi ho gaya hai...! jo thopa ja rha hai wo swikar bhi krte hai & dosh lagane per bhi rosh nhi prakat krte hai..isliye manoranjan k saadhan to bahut hai lekin unka koi auchitya nhi...!afsos ham khud hi apne haath se apne hi samaj, desh & sabhyata ka hanan kar rhe hai..!

    Abhilekh

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